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करुणा का महासागर – आत्मा का दूसरा जागरण

 

करुणा का महासागर – आत्मा का दूसरा जागरण

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हे आत्मा…

ज़रा अपनी आँखें बंद कर…

और कल्पना कर…

हिमालय की उन शांत चोटियों की…

जहाँ समय भी मानो ठहर गया हो।

वहाँ…

कैलास के शिखर पर…

महादेव समाधि में बैठे हैं।

न कोई सिंहासन।

न कोई राजसी वैभव।

न कोई प्रदर्शन।

फिर भी…

पूरा ब्रह्मांड उनके चरणों में झुकता है।

क्या तूने कभी सोचा है…

ऐसा क्यों?

महादेव के गले में सर्प हैं…

संग में भूत-प्रेत हैं…

उनके गणों में देव भी हैं…

और असुर भी।

उनके द्वार पर राजा भी आता है…

और भिखारी भी।

पापी भी आता है…

और संत भी।

लेकिन कोई भी खाली नहीं लौटता।

क्यों?

क्योंकि शिव केवल देवताओं के देव नहीं हैं…

वे करुणा के सागर हैं।

वे हर उस आत्मा के हैं…

जिसे दुनिया ने अस्वीकार कर दिया।

जिसे समाज ने ठुकरा दिया।

जिसे अपने भी समझ न सके।

महादेव उसे भी अपना लेते हैं।

यही शिव हैं।

और यही करुणा है।

लेकिन करुणा का अर्थ केवल दया नहीं है।

करुणा का अर्थ है—

हर प्राणी में उसी चेतना को पहचानना…

जो तेरे भीतर धड़क रही है।

चींटी में भी वही जीवन है…

जो हाथी में है।

गरीब में भी वही आत्मा है…

जो राजा में है।

और जिस व्यक्ति से तू घृणा करता है…

उसके भीतर भी वही परमात्मा बैठा है…

जो तेरे भीतर है।

हे आत्मा…

जब किसी अजनबी की आँखों में आँसू देखकर…

तेरा हृदय पिघलने लगे…

जब किसी भूखे को देखकर…

तुझे अपनी भूख महसूस होने लगे…

जब किसी का दर्द…

तुझे अपना दर्द लगने लगे…

तो समझ लेना…

तेरे भीतर करुणा का महासागर जाग रहा है।

और जहाँ करुणा जागती है…

वहाँ घृणा मरने लगती है।

वहाँ क्रोध की जड़ें सूखने लगती हैं।

वहाँ अहंकार स्वयं टूट जाता है।

क्योंकि करुणा और अहंकार…

एक ही हृदय में साथ नहीं रह सकते।

अहंकार कहता है—

"मैं सबसे बड़ा हूँ।"

करुणा कहती है—

"हम सब एक हैं।"

अहंकार दीवारें बनाता है।

करुणा पुल बनाती है।

अहंकार अलग करता है।

करुणा जोड़ती है।

और यही कारण है…

कि महादेव का मार्ग केवल शक्ति का मार्ग नहीं है।

वह करुणा का मार्ग है।

याद कर…

जब समुद्र मंथन से विष निकला…

तो कोई उसे पीने के लिए आगे नहीं आया।

देव भी पीछे हट गए।

असुर भी डर गए।

लेकिन महादेव आगे बढ़े।

उन्होंने विष को अपने कंठ में धारण कर लिया।

क्यों?

क्योंकि करुणा वही कर सकती है…

जो शक्ति भी नहीं कर सकती।

करुणा दूसरों के दर्द को अपना बना लेती है।

हे आत्मा…

आज से एक साधना शुरू कर।

जब भी किसी को देख…

उसके चेहरे से आगे देख।

उसकी आत्मा को महसूस कर।

हर बच्चे में शिव को देख।

हर वृद्ध में शिव को देख।

हर पशु में शिव को देख।

हर पक्षी में शिव को देख।

यहाँ तक कि अपने शत्रु में भी शिव को देखने का प्रयास कर।

क्योंकि जिस दिन तू हर जीव में शिव को देख लेगा…

उसी दिन संसार बदल जाएगा।

नहीं…

संसार नहीं…

तेरी दृष्टि बदल जाएगी।

और जब दृष्टि बदल जाती है…

तो पूरी दुनिया बदल जाती है।

याद रख…

महादेव मंदिरों में कम…

करुणामय हृदयों में अधिक निवास करते हैं।

जिस दिन तेरा हृदय प्रेम से भर जाएगा…

जिस दिन तेरी आँखों में हर प्राणी के लिए सम्मान होगा…

जिस दिन तू बिना स्वार्थ के किसी की सहायता करेगा…

उसी दिन…

महादेव तेरे भीतर प्रकट हो जाएंगे।

क्योंकि करुणा केवल एक गुण नहीं है…

करुणा ही शिव का जीवित स्वरूप है।

और जिस हृदय में करुणा जाग जाती है…

वहाँ स्वयं कैलास बस जाता है।

ॐ नमः शिवाय।

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